Hindi Pravachan

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सत्‌ – चित्‌ -आनन्द क्या हैं ? ( What is Sat – Chit – Anand? ) भगवान हैं यह जानने से, महसूस करने से, पहचानने से जो आनन्द होता हैं वहीं भगवान का सहीं स्वरुप हैं। इसके बारे में परमपूज्य सद्गुरू श्री अनिरुद्ध बापूनें अपने २८ नवंबर २०१४ के हिंदी प्रवचन में बताया, जो आप इस व्हिडिओ में देख सकते हैं। ॥ हरि ॐ ॥ ॥ श्रीराम ॥ ॥ अंबज्ञ

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भगवान को हर काम में शामिल करो ( Include God in everything you do ) आपकी हर कठिनाई में आप भगवानसे (God) मदद मांगिये । छोटी चीज के लिये भी भगवान (God) को पुकारना सिखो। There is nothing wrong. इसके बारे मे परमपूज्य सद्गुरू श्री अनिरुद्ध बापूने अपने २८ नवंबर २०१४ के हिंदी प्रवचन मे बताया, जो आप इस व्हिडिओ में देख सकते है । ॥ हरि ॐ ॥ ॥

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सद्‍गुरुतत्त्व पर मनुष्य का जितना विश्वास होता है, उतनी कृपा वह प्राप्त करता है (SadguruTattva renders to everyone according to his faith) भगवान ने इस विश्व को अपने सामर्थ्य से बनाया है, उन्हें किसीकी जरूरत नहीं पडी थी। वे हर एक के जीवन में उस व्यक्ति के लिए जो भी उचित है वही करते हैं; बस मानव को भगवान पर भरोसा रखना चाहिए। ‘भजेगा मुझको जो भी जिस भाव से।

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अनुभव यह वास्तव एवं सत्य भी होता है (Experience Is The Fact And The Truth Also) अनुभव यह महज महसूस करने की बात नहीं होती, बल्कि वह प्रत्यक्ष सत्य साक्षात्कार होता है। सद्‍गुरुतत्त्व के प्रति रहने वाले भाव के कारण जो परिवर्तन जीवन में आते हैं, उसे अनुभव कहते हैं। अनुभव बारे में परम पूज्य सद्गुरु श्री अनिरुद्ध बापू ने अपने २० नवंबर २०१४ के हिंदी प्रवचन में बताया, जो

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आदिमाता जिसे क्षमा न कर सके इतना बडा कोई पाप ही नहीं है (There Is No Sin Too Big For Aadimata To Forgive) मातृवात्सल्य उपनिषद्‍ में हम पढते हैं कि कोई भी यदि सच्चे दिल से पश्चात्तापपूर्वक आदिमाता की शरण में जाकर सुधरने के लिए प्रयास करता है तो वह चाहे कितना भी पापी क्यों न हो, यहाँ तक कि राक्षस या शैतान भी क्यों न हो, मगर तब भी

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साईनाथ कहते हैं- भजेगा मुझको जो भी जिस भाव से। पायेगा कृपा मेरी वह उसी प्रमाण से (Sainath Says, I Render To Each One According To His Faith) सद्‍गुरुतत्त्व की उपासना करने वाले श्रद्धावानों के मन में ‘यह मेरा सद्‍गुरु मेरा भला ही करने वाला है’ यह भाव रहता है। इस एकसमान भाव के कारण सामूहिक उपासना में सम्मिलित होनेवाले श्रद्धावानों को व्यक्तिगत उपासना की अपेक्षा उस सामूहिक उपासना से

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अपराधभाव से स्वयं को मत कोसिये (Don’t Curse Yourself By The Feeling Of Guilt) अपने हाथों हुई गलती के लिए मन में पश्चात्ताप की भावना का होना यह स्वाभाविक और आवश्यक तो है, लेकिन अपनी गलती के लिए स्वयं को लगातार कोसते रहना यह मुनासिब नहीं है। ऐसा करने से वह मनुष्य अपने साथ साथ घर का भाव भी दुखी कर देता है। अपराधभाव की खाई में स्वयं को न

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भाव इस शब्द में समग्रता है (There Is A Wholeness In The Word ‘Bhaav’) मानव के भीतर रहने वाले ‘मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार’ ये चारों मिलकर किसी व्यक्ति, वस्तु या घटना के प्रति उठने वाले प्रतिसाद, भावना आदि को मिलाकर जो सहज स्पन्द उत्पन्न होता है, उसे भाव कहते हैं। भाव इस शब्द में समग्रता है, इस बारे में परम पूज्य सद्गुरु श्री अनिरुद्ध बापू ने अपने १६ अक्टूबर

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क्रिया के पीछे का भाव अधिक महत्त्वपूर्ण होता है (The Bhaav Behind The Action Is More Important) स्कूल न जाने वाले बच्चे की मरम्मत करने वाली माँ की बच्चे को पीटने की वह क्रिया ऊपरी तौर पर अनुचित क्रिया लग सकती है, लेकिन उसके पीछे रहने वाला उसका हेतु और कारण बच्चे का भला करना यही है और इन सबके पीछे का भाव ‘अपने बच्चे का भला करना’ यह होने

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महज क्रिया पर से भाव को नहीं जाना जा सकता (Bhaav Can Not Be Judged Only By Action) अन्य किसी को रोता देखकर आने वाले आँसू यह एक प्रकार की अभिव्यक्ति है। लेकिन कोई रो रहा है, तो सिर्फ़ उसकी रोने की उस क्रिया को देखकर उसके भाव के बारे में कहा नहीं जा सकता। महज क्रिया पर से भाव को नहीं जाना जा सकता, बल्कि उस क्रिया के पीछे