Hindi Pravachan

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अन्त:प्रकाश – भाग २ (The Inner Light – Part 2) ‘दिव्यत्व’ यह प्रकाशदायी तत्त्व है। सिर्फ बाह्य लोक में ही नहीं, बल्कि मानव के अन्दर भी यह दिव्यत्व रहता है। मानव के भीतर रहनेवाला अन्त:प्रकाश (The Inner Light) यानी विवेक यह भगवान के द्वारा मानव के अंदर प्रकाशित किया गया दिव्यत्व है, जिसके जरिये वह भगवान के साथ जुडा रह सकता है। भगवान के द्वारा जलायी गयी इस ज्योति को

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अन्त:प्रकाश – भाग १ (The Inner Light – Part 1) ‘दिव्यत्व’ यह प्रकाशदायी तत्त्व है। सिर्फ बाह्य लोक में ही नहीं, बल्कि मानव के अन्दर भी यह दिव्यत्व रहता है। मानव के भीतर रहनेवाला अन्त:प्रकाश (The Inner Light) यानी विवेक यह भगवान के द्वारा मानव के अंदर प्रकाशित किया गया दिव्यत्व है, जिसके जरिये वह भगवान के साथ जुडा रह सकता है। भगवान के द्वारा जलायी गयी इस ज्योति को

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साँस और दिव्यत्व – भाग २ (Breathing And Divinity – Part 2) जो सही है उसे स्वीकार करना और जो गलत है उसे बाहर फेंकना यह क्रिया साँस प्रक्रिया में सहज रूप में होती रहती है और इसीलिए साँस को भी दिव्य माना गया है। मानव का बच्चा जन्म लेते ही रोने लगता है। दर असल वह रोता नहीं है, बल्कि साँस लेता है। मानव की मृत्यु का वर्णन करते

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साँस और दिव्यत्व – भाग १ (Breathing And Divinity -Part 1) जो सही है उसे स्वीकार करना और जो गलत है उसे बाहर फेंकना यह क्रिया साँस प्रक्रिया में सहज रूप में होती रहती है और इसीलिए साँस को भी दिव्य माना गया है। मानव का बच्चा जन्म लेते ही रोने लगता है। दर असल वह रोता नहीं है, बल्कि साँस लेता है। मानव की मृत्यु का वर्णन करते हुए

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भगवान किसी भी संकट से बडा है (God is Greater Than Any Problem) भगवान पर रहनेवाला विश्वास यह सबसे अहम बात है। भगवान पर का भरोसा कभी भी हिलने मत दीजिए। जितना संकट बडा उतना भगवान (God) पर का विश्वास भी बडा रखो। मानव के लिए कोई संकट बडा हो सकता है, मगर भगवान (God) किसी भी संकट से बडा ही है, इस बारे में परमपूज्य सद्गुरू श्री अनिरुद्ध बापूनें

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धारा शब्द को उलटा करने पर राधा शब्द बनता है (The Revert of Dhara Is Radha) मनुष्य के जीवन का सफर यह एक ‘धारा’ है। सृजन से लेकर विनाश तक बहनेवाली यह जीवनरूपी धारा होती है। विधायक से विघातक की दिशा में रहनेवाली गति धारा कहलाती है। विघातक शक्ति का रूपान्तरण जो विधायक शक्ति में करती है, वही राधा (Radha) है। धारा शब्द को उलटा करने पर राधा (Radha) शब्द

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सजल मूल जिन्ह सरितन्ह नाहीं … (Sajal Mool Jinha Saritanha Naahi …) गंगाजी जैसी बारह महीने बहनेवाली नदियों का मूल सजल होने के कारण वे कभी नहीं सूखतीं। इसी तरह भगवान का नाम जिस मानव की जीवन-नदी का मूल होता है, उसका जीवन कभी नहीं सूखता। वहीं, जिन्हें केवल बरसात का ही आसरा है, वे वर्षा के बीत जाने पर फिर तुरंत ही सूख जाती हैं। भगवान से विमुख होकर

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दिव्य शक्ति (Divya Shakti) कार्य की दृष्टि से शक्ति के विधायक और विघातक इस तरह दो प्रकार माने जाते हैं। मानव के जीवन में विधायक शक्ति को कार्यान्वित कर विश्व की विघातक शक्तियों को कम करने का काम दिव्यशक्ति ( Divya Shakti ) करती है। ‘जिससे पवित्रता और आनन्द उत्पन्न होता है, वही दिव्य है’ और जो इस दिव्यता को प्रदान करती है उसे देवी कहते हैं। ‘राधा’ यह इस

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विचार के विधायक और विघातक ये दो पहलू – भाग २ (Constructive And Destructive Aspects Of Thought-Part 2) हर एक विचार (Thought) की, हर एक बात की मानव के जीवन में एक भूमिका रहती है। विचार (Thought) या कोई बात ये विधायक और विघातक दो प्रकार के रहते हैं। वह विचार या बात विधायक या विघातक इनमें से किस रूप में कार्य करेगी, यह मानव अपनी कर्मस्वतन्त्रता का उपयोग किस

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विचार के विधायक और विघातक ये दो पहलू – भाग १ (Constructive And Destructive Aspects Of Thought-Part 1) हर एक विचार (Thought) की, हर एक बात की मानव के जीवन में एक भूमिका रहती है। विचार या कोई बात ये विधायक और विघातक दो प्रकार के रहते हैं। वह विचार (Thought) या बात विधायक या विघातक इनमें से किस रूप में कार्य करेगी, यह मानव अपनी कर्मस्वतन्त्रता का उपयोग किस

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श्रीत्रिविक्रमके ‘त्रातारं इन्द्रं अवितारं इंद्रं..’ इस महत्वपूर्ण मन्त्र का अर्थ ( The Meaning of Important mantra of shree Trivikram – ‘Trataram Indram Avitaram Indram …’ ) परम पूज्य सद्‌गुरु श्री अनिरुद्ध बापु ने गुरूवार ६ मार्च २०१४ के हिंदी प्रवचन में श्रीत्रिविक्रमके ‘त्रातारं इन्द्रं अवितारं इंद्रं…..’ इस महत्वपूर्ण मन्त्र का अर्थ स्पष्ट किया है। वह आप इस व्हिडियो में देख सकते हैं। ॥ हरि ॐ ॥ ॥ श्रीराम ॥ ॥

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भगवान हमारा भार उठाने के लिये तैयार है। ( God will take care of your burdens ) हम भगवान (God) से सब कुछ माँग सकते है। अगर हमारी श्रद्धा कम हो रही है, तो भी हमे उसीसे माँगनी चाहीये। हम भगवान से श्रद्धा, विश्वास, भरोसा, सबुरी सब कुछ माँग सकते है। इसके बारे में परमपूज्य सद्गुरू श्री अनिरुद्ध बापूनें अपने २८ नवंबर २०१४ के हिंदी प्रवचन में बताया, जो आप

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सत्‌ – चित्‌ -आनन्द क्या हैं ? ( What is Sat – Chit – Anand? ) भगवान हैं यह जानने से, महसूस करने से, पहचानने से जो आनन्द होता हैं वहीं भगवान का सहीं स्वरुप हैं। इसके बारे में परमपूज्य सद्गुरू श्री अनिरुद्ध बापूनें अपने २८ नवंबर २०१४ के हिंदी प्रवचन में बताया, जो आप इस व्हिडिओ में देख सकते हैं। ॥ हरि ॐ ॥ ॥ श्रीराम ॥ ॥ अंबज्ञ

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भगवान को हर काम में शामिल करो ( Include God in everything you do ) आपकी हर कठिनाई में आप भगवानसे (God) मदद मांगिये । छोटी चीज के लिये भी भगवान (God) को पुकारना सिखो। There is nothing wrong. इसके बारे मे परमपूज्य सद्गुरू श्री अनिरुद्ध बापूने अपने २८ नवंबर २०१४ के हिंदी प्रवचन मे बताया, जो आप इस व्हिडिओ में देख सकते है । ॥ हरि ॐ ॥ ॥

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सद्‍गुरुतत्त्व पर मनुष्य का जितना विश्वास होता है, उतनी कृपा वह प्राप्त करता है (SadguruTattva renders to everyone according to his faith) भगवान ने इस विश्व को अपने सामर्थ्य से बनाया है, उन्हें किसीकी जरूरत नहीं पडी थी। वे हर एक के जीवन में उस व्यक्ति के लिए जो भी उचित है वही करते हैं; बस मानव को भगवान पर भरोसा रखना चाहिए। ‘भजेगा मुझको जो भी जिस भाव से।