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बापू अलोट शक्ती का स्रोत – हमारे सहाब

Dhanesh-Yogesh – (योगेश-धनेश हेदवीकर)

ल्लखांब, जि्म्नॆशिअम, तलवारबाजी, दांडपट्टा, प्राच्यविद्या, बलविद्या, क्रिकेट और शरीरशास्त्र में निपुण व्यक्तिनें उचित मार्गदर्शन करना, याने की “साहब’ ने इसपर बोलना। शरीर बलकें साथ-साथ मानसिक बल भी विकसित करने समय ली जानेवाली दक्षता, याने की साहब का विचार। शक्तिसामर्थ्य विकसित करते समयहीं हर एक का मन संभालने की मृदुता दिखानें की, दो विरुद्ध छोर के गुण एक ही समय दिखानेवाला हमारा ह्युमंगस साहब। मल्लखांब हो या, प्राच्यविद्या हो या और कुच भीं, कसरत के गार्डिअन नही तो “साहब” के पास आज भीं हम कसरत कीं शुरुवात का दौर, यही नियम सें देखते है। शायद “बापू” यही शुरुवात हो इस सबकी।

अंदाजसे १९८७ में मै और धनेश शिवाजी पार्क कें समर्थ व्यायाम मंदीर में दाखला लिया। उस समय मैं पाँचवी कक्षा में था। और धनेश तिसरी कक्षा में। १९९५ तक कुस्ती, ज्युडोका राज्यस्तरीय, राष्ट्रीयस्तरपर हमने बहुत सीं स्पर्धाओं में सहभाग लिया। १९२३ में स्थापन हुई इस “समर्थ व्यायाम मंदीर सें ही हम अनेक स्पर्धाओमें सहभागी हुए। “समर्थ व्यायाम मंदीर” के खिलाडीओंको क्रीडा क्षेत्रमें बडा मान मिलता था। क्रीडाक्षेत्रमें “भारत’ का नाम आगे करने में जो खिलाडी थे, उन्हे “समर्थ व्यायाम मंदीर” ने ही तैयार किया था। हमारे पिताजी भी व्यायामक्षेत्र में ही थे। १९७० मे वह “महाराष्ट्र श्री” का किताब जीत चुके थे। इसीलिये कसरत करने की चाहत हमें घरसें लगी थी।

हमने समर्थ व्यायाम मंदिर से ही मल्लखांब सिखनें को शुरुआत की। किसी भी स्पर्धामें सहभाग लेना है, तो उसकी पहली “सिढी’ है मल्लखांब-जिम्नॅस्टिक। सारे शरीर से कसरत करानेवाले यह दो खेल याने की “मदर ऑफ स्पोर्टस” है। आजभी अगर किसी को भी खेल में अगर रिसर्च करना है, तो “स्पोर्टस मेडिसीन” या स्पोर्ट्स फिजीओलजीका अभ्यास करना हों तो बहुत सें डाक्टर “मल्लखांब का निरीक्षण करते है। सिर्फ भारत के ही नहीं, परदेस के डाक्टर भी मल्लखांब का अभ्यास करते हुए नजर आते है। यही मल्लखांब सिखतें समय अनेक डाक्टर यहा आके हम “समर्थ व्यायाम मंदिर के स्टुडन्टस को पाठ करवाते। शरीरशास्त्र समझानें का उनका नियम था। स्पोर्टस मेडिसिन देकर कुछ निरीक्षण करनेकी प्रॆक्टीस करने के लिए यह डाक्टर “व्यायाम मंदिर’ मे आते थें। बोर्ड कें उपर शरीररचना की आकृती निकालके समझाते। लेकिन वह हमारी उमर ही क्या थी। की, थिओरेटीकल लेक्चर्स हमारे सिर के उपर से जाते थे। इसलिए हमें यह क्लास बहुत ही बोरींग लगते थे।

उसी अवस्था में हम राष्ट्रीयस्तर कें शिक्षकों के मार्गदर्शनसें मल्लखांब सीख रहे थे। ऐसेही एक दिन प्रॆक्टीस कें समय हमारे सर कैलासवासी शशिकांत रावंगणने हमें स्कूल में एक डाक्टर आए है ऐसा कहा। मई १९९५, सर नें कहा की डाक्टर कों हमे मिलना है। सर ने कहा वो करना ही है, यह स्कूल का अनुशासन था। इसीलिये आज एक और डाक्टर को मिलना है, और ये अब हमें क्या नया बताने वाले है? इन विचारोंने हम डाक्टर को मिलने गए| उस समय वह हमारे श्रेयस सर के साथ बातें कर रहे थे।

डाक्टर को मिलने गए तो वहाँ सीन क्या था? एक उंचे तंदरुस्त,मजबूत,(ह्युमंगस) आदमी सरसे बातें कर रहा है। उन्हे देखकर हमे लगा यह कौन है? कोई कुस्ती के अखाडे का पहलवान या रेसलर हमें मिलने आया है की क्या? उन्हे देखकर हम दो-चार मिनिट उनकी और देखते ही रहे। फिर हमारे ही एक दोस्त ने कहा, की यही डाक्टर है। फिर हमारे ही एक दोस्त ने कहा, की “यही डाक्टर है।

उस समय हम दूरसें ही बापूके पास ही देख रहे थे। उस समय बापू कीं तबीयत याने की… देखने जैसी थी। उस समय तो बापू ऐसे थे ना, की जब बापू रास्ते से चलते तो उन्हे लोग हात के काम छोडके देखते रहते थे। क्या “शरीर सौष्ठ्व” था। ऐसे बापूकों प्रथम देखने के पहलें हमें लगता था कोई ऐसा हीं लेक्चरर डाक्टर होगा , लेकिन प्रत्यक्ष बापू को देखा तो… वो जैसे दिखे उन्हें देखते ही हम “अचंबित” हुए। ज्युडो, रेसलिंग, जिम्नॆशिअम और मल्लखांब जैसे अनेक खेलों में सहभागी होने वालोंमे से हम भी थे। “स्पोर्टस ऑफ इंडिया” की सबसे ज्यादा ताकदवान स्पर्धामें भी हम खेलतें थे। हमारे सर उस समय २६-२७ साल के थे। उन्होंने हमे इस प्रकारसे तैयार किया था, की हमारी ताकद, शक्ति उन्होंने बढाई थी। एक बार हमारे व्यायाम मंदीर का एक पुराना वृक्ष गिर गया था। कम से कम ७०-८० साल पुराना झाड गिरने से हमारे कसरत करने की जगह अब अड गईं थी। वह इतना बडा झाड था लेकीन हम दोनों भाईयोंने उसे उठाके बाजू में किया था। ऐसे ही समय उस दिन श्रेयस सर ने हमारी पहचान व्यायाम मंदीर में आए हुए डाक्टर अनिरुद्ध जोशी से करके दी।
यह हमारें व्यायाम मंदीर के दो बैल “योगेश और धनेश”…

… ऐसीही हमारी पहचान श्रेयस सर ने करके दी। जब हम बापू की ओर देख रहे थे, तब उन्होंने ही हमे प्रेमसे पुकारा,”आओ बच्चों”।

निचली आवाज में (खर्ज्या स्वर में) उन्होंने हमे “आओ बच्चों’ बोलतेही हमें शॉक लगा। फिर बापूने हमारा चेकअप किया। इसके पहले इस व्यायाम मंदीर में आए डाक्टर्स हमारे सरसे ही बातें करते या फिर जानकारी देने के लिये क्लास लेते। उनका हम बच्चों के साथ कभी सीधा संवाद नहीं हुआ। हम जैसें लडकों का मेडिकल चेकअप करनेवाले खुद बच्चों को प्रत्यक्ष रुप से प्रात्यक्षिक दिखाके समझानेवाले यह पहले ही डाक्टर थे। हमारे “साहब” याने की डाक्टर अनिरुद्ध जोशी। हमें भी उनके प्रति कुतुहल जागृत हुआ, यह असल जिंदगी में कौन है और क्या करना चाहते है “साहब’?

हमनें जब पहलीबार बापू को देखा, उसी समय सें हम उन्हें “साहब’ कहकर ही पुकारने लगे। आजतक, आज भी वह हमारे “साहबही’ है। डाक्टर अनिरुद्ध जोशी नाम से उनकी हमारी पहचान हुई। लेकीन हमनें कभी उनको डाक्टर करके पुकारा नही। हम उन्हे “साहब” नाम से ही पुकारते।

“साहब” कल क्या करू? क्लिनिक पे आऊ क्या? साहब आप हमे ये बताओगे क्या? “साहब हमारे यहाँ दर्द हो रहा है? वहाँ से ले के आजतक हमारे “साहब” हमारे साथ ही है।
योगेश १६ साल का और धनेश १४ साल का था, जब हमारी और बापू की पहचान हुई। उस समय हम दोनों मिलकर चारसौं किलो वजन उठाते थे। ऐसे ही हमारी मेडिकल चेकअप करके, हमारे सामने आकर खडे हुए और अपने दोनो हात हमारी और फैलाकर बोले,” अब मुझे खींचो। हम दोनों ने उनके कहने पर उनके दोनों हात पकडकर उन्हें खीचनें का प्रयत्न शुरु किया। लेकिन “साहब अपनी जगह से हिले भी नहीं। इसीलिए गुस्से से पुरी ताकद लगाकर अब हम उन्हें खीचनें लगे, लेकीन तभी भी हम डाक्टर साहब को एक सूत भी खीच नही पाए।

हम हैरान थे उसी वक्त डाक्टर साहब नें एक हात नीचे किया और दुसरा हात हमारे सामने रखकर, दोनों को उस हाथ को पकडकर खीचनें को कहा। तीनसौ-चारसौ किलो वजन उठानेवाले हम, डाक्टरसाहब नें एक हात आगे किया था। हमें व्यायाम मंदीर के सबसें ताकदवान बच्चें कहकर पुकारा जाता था, लेकीन हम इस ताकद की, परीक्षा में मात्र हार गए। ३००-४०० किलो वजन उठानेवाले हम दों बैल उस दिन चालीस साल की उम्र के पास पहुँचे हुए डाक्टर के ताकद के सामने हार गए थे। हमारें मन में कुतुहल था, आश्चर्य था, की इस डाक्टरके पास इतनी ताकद कैसे?

आज इस घटना को १५ साल बीत गए। आज हम तीस साल कें आसपास पहुँचे है, तो हमारे “साहब”पचास साल की उमर पार कर गए, इस बीच बापूनें जो हमे मार्गदर्शन किया है, जिसकी वजह से आज हमारी वजन उठाने की क्षमता भी दुगनी हो गई है। उस समय हम ३०० किलो वजन उठातें थे, तो अब ६०० किलो उठातें है। लेकिन आज भी ५५ साल की और बढतें हमारे डाक्टर साहब को उनकी मर्जी के खिलाफ खीचकें एक सूत भी हिलाना, हम दोनो कों मिलके भी पॉसीबल नहीं होता। उनकी हमारी जान-पहचान होने कें बाद देड-दो सालों के बाद ताकद की इस कसौटी कें बारें में चर्चा हुई। उस समय “साहब” ने मुझें स्पष्ट शब्दों मे कहा, अरे, तुम मुझें क्या, मेरा अंगूठा भी अगर एकसूत हिला सके ना तो तुम्हें बाकी कुछ करने की जरुरत भी नहीं’। लेकिन आजतक हम यह मुमकीन नहीं कर पाए।

इतना ही क्यों, बापू ने हमें चुनकर प्रशिक्षण दिया। जिसमें उन्होंने हमें प्राच्यविद्याओं की पहचान कराके दी। प्राच्यविद्या पुन्रुज्जीवित करनेके लिए बापूने अभ्यासक्रम शुरु किया है। इस अभ्यासक्रम के एक कोर्स के दरमियाँ हमारे “साहब” प्रशिक्षण स्कुल आ पहुँचे। उस समय १०८ विद्यार्थी एक बाजू में और बापू एक बाजू में। ऐसें इस अभूतपूर्व ताकद के खेल में १०८ विद्यार्थी होते हुए भी इस एक सूत भी “साहब” को खींच नहीं सके।

इतनी अफाट शक्ती सें भरे हमारे “साहब” कसरत कैसी करनी है, यह प्यार सें समजातें थे। इसलिये हमें भी कसरत से हमेशा के लिए लगाव लग गया। कसरत कैसी करनीं चाहिए, इतना ही नहीं, मल्लखांब, जिम्नॆस्टिक या कसरत करके होनेवाली चोट को भी हमारे “साहब हमें देते थे। सिर्फ कसरत करने कें सबक वह हमें नही देते, बल्कि यह सबक देने के पहले उन्होंने अपना शरीर भी कमाया हुआ था। इसलिए अपना अनुभव हमें बताते थे। उनके पैरो का कल्ला, पिंडली इतनी मोटी थी, जो हमारे दो हातों के बीच भी नहीं बैठती थी। उनकी छाती और कंधे फैले हुए थे। पैर के कल्ले कभी-कभी एकदम पथ्थर जैसे और कभी-कभी रुई से भी कोमल। “मसल कंट्रोल का इससे उत्कॄष्ट कसब कोई दिखा नहीं सकता। आज हम बॉडी बिल्डर्स को भी मार्गदर्शन करते है, लेकिन “साहब जैसे कल्ले आजतक हमने किसी के देखे नहीं।

हमारे शरीर का अभ्यास और खेलकी तरफ आकर्षण देखकर उन्होने, “बॉडीबिल्डींग’ इस क्षेत्रमें हमे जाने के लिए प्रवृत्त किया। उसके बाद की उनके साथ हर मुलाकात में मल्लविद्या, पुरातन भारतीय व्यायाम प्रकार. शरीरशास्त्र जैसे अनेक विषयोंका अफाट ज्ञान अपने ज्ञानकोश से महत्त्वपूर्ण भाग हमें सिखाते गए। मुदगल, सूर्यभेदन, वज्रमुठी, तलवार, दांडपट्टा और मार्डन सायन्स ऐसे विषयोंपर घंटो बोलते और उसके अलग-अलग द्रूष्टीकोन स्पष्ट करके बताते। वह जो जानकारी हमें देते उसमें से बहुतसा भाग हमारे क्षेत्रकें तज्ञोंको भी ज्ञात नही था। सिर्फ श्री समर्थ व्यायाम मंदीर के राज्य राष्ट्रीय खिलाडीओंको ही नही, बल्कि इतर खिलाडीओं को भी वह फ्री में मेडिकल सोल्युशन देकर मार्गदर्शन करते और आज भी कर रहे है। “साहब” सिर्फ समर्थ के लडकों ही देखते नही थे। बल्कि चिपळूण, पुणे, रत्नागिरी से आनेवाले मल्लखांब के खिलाडीयोंको भी हमेशा चेक करके मार्गदर्शन करते थे। कभी-कभी “बापू’ सुचितदादाकों भी हमारा लेक्चर लेने को कहते। उस वक्त दादा हमें फिजिऒलॊजी और एनोटोमी के बारें मे हमें और हमारे सर को भी हप्तों मे दो बार दो-दो घंटे मार्गदर्शन करते थे।

इस दरमियाँन, बापूने खुद दो साल के लिए ….. बुक करके कसरत के संशोधन किए। जिसके बाद बापूने हमें पुरानेबल विद्याओंकी जानकारी बतादी। इनमे से तो कुच विद्याओंके नाम हमने कभी सुभे भी नही थे। उसमे भी सूर्यनमस्कार बापू का सबसे पसंदीदा व्यायाम था और विशय। इसलिए २०-२२ दिन रोज वो हमें एक-एक घंटा सूर्यनमस्कार के बारे मे जानकारी देते रहते। सूर्यनमस्कार के भी प्रकार होते है। उस समय हम चतुरांग नमस्कार करते थे। बाकी के प्र्कार भी उन्होने ही हमे बताए। चतुरांग नमस्कार हम जो करते थे उसकी पद्धती अलग थी। अष्टांग सूर्यनमस्कार भी पहचान उन्होने हमे करा दी। वीरभद्र सूर्यनमस्कार कैसे होता है, सूर्यनमस्कार यही सूर्यभेदनकी पहली सीढी कैसी? कौन से नमस्कार से क्या फायदा होता है, यह विज्ञानकें आधारपर डाक्टर साहब हमें समझातें। वह जो जानकारी देते, उसमें की बहुतसी जानकारी किसी भी पुस्तक में हमे कभी नहीं मिली।

मल्लखांब(मलखम) के विशिष्ट प्रकार विशिष्ट समय में करने से, उसके बहुत फायदे होते हैं। लेकीन यह प्रकार और उसके फायदे बहुत ही कम हमें मालूम थे। हमारे श्रेयस सर भी कहते, अरे! यह जो डाक्टर कुच बता रहें है ना, यह मैं भी पहली बार सुन रहा हूँ। उनका यह ज्ञान भी उनकी शारीरीक क्षमता जैसा ही अफाट है।

साहब-अनिरुद्ध बापू

साहब – अनिरुद्ध बापू

“साहब’ कब क्या बताएंगे, उसका कोई नियम नहीं। हमें मार्गदर्शन करते समय बापू कहते “अरे! पानी पिलो रे”। पानी का महत्त्व क्या? तुम्हें ज्यादा पानी पीना चाहिए। धनेशकों एक दिन अचानक “साहब’ मिले। उन्होने पूछा, तू पानी बहुत कम पीता है क्या? धनेशने कहा की मैं रोज तीन-साडेतीन लीटर पानी पिता हूँ। उसपर वह बोले अब कौन सा महिना चालू है? अक्तूबर और आप उष्ण प्रकृती के हो। तुम्हें कितना पानी पिना पडेगा? और दस ग्लास बढाओं। ये जो उनका कहना था, यही प्रॅक्टीकल था। आज ही नहीं, उस वक्त भी, पहले, कभी बापू को मिलने जाते, तब सिर्फ दरवाजा खोलते ही, “साहब” हमे कहते, क्यों हात दर्द कर रहा है, जाओ और यह दवाई लो, फिर ये करो-वह करो, तील का तेल लगाओ। कुछ मिलने की जरुरत नहीं है। जाओ यहासे अभी। ऐसे बहुत बार हुआ। हमारे प्रॊब्लेम हमारे कहने के पहले ही साहबही उस प्रॊब्लेम का सोल्युशन बताकर हमें वापस भेजते थे।

योगेश एक बार बापू के परेल के क्लिनिक में गया था। उसे देखकर बापू बोले,” अरे यह क्या? हप्तेभर तुमने बहुत घी खाया लगता है। जाओ और घी का प्रमाण कम करो।’ ऐसा जब “साहब” सामनेसे कहने लगते तो सिर खुजानेके सिवा और कुछ भी नहीं कर सकते थे। अरे, यह हमारे साहब, कुछ भी बोलने के पहले ही, हमारी प्रॊब्लेम्स खुद कैसे बताते है? जैसे की, अरे!तुम कसरत ऐसी कर रहे थे। लेकीन तुम्हे ऐसे करना था। शुरुवात के दिनों मे हमे यह मालूम न था की, साहब के बारे में क्युरिओसिटी निर्माण हो गयी थी।

हमारे व्यायाम मंदिर मे एक लडकी कुछ ही सालों मे, छत्रपती पुरस्कार के लिए पात्र होनेवाली थी। और एक स्पर्धा के पहले हमारे श्रेयस सर ने अदितीको गोल्ड मेडल मिलनेवाला है ऐसा भी कहा था। लेकीन साहब बोले, अरे! यह लडकी यह स्पर्धा खेलेगी तब ना? तब हमारे सामने प्रश्नचिन्ह खडा हो गया, अरे साहब ऐसा क्यों कह रहे है? दो दिनों के बाद स्पर्धा थी इसीलिये कुछ नुकसान न हो इसीलिये हम कोई भी प्रॅक्टीस नहीं कर रहे थे। इसिलिए अदिती स्पर्धा में ना खेलने का कोई सवाल ही पैदा नहीं हो रहा था और सबको अदितीपर इतना विश्वास था, की यह गोल्ड मेडल अदिती जरुर जीत जाएगी। लेकीन, स्पर्धा के पहले ही फ्लॅगमार्च करते समय अदिती का पैर गड्डे मे जाकर लचक गया। जिससें की उसका घुटना फ्रॅक्चर होनेपर हमने उन्हें फोनपर कहा। उन्होंने कहा, हा मुझें पता चला। ऐसा कहकर वह खुद आए। कुछ समय के बाद अदिती को ब्लड कॅन्सर हुआ। लेकीन आज भी, एट द एज ऑफ ३२ शी इज इन अमेरीका, अँड फिट अँड फाईन। बीचमें मेरा काफ मसल फट गया। डाक्टरने ऒपरेशन करने के लिए कहा था। लेकीन, हमारे साहबने मुझें सिर्फ तीन हप्तों तक स्वीमींग करने के लिए कहा। उसके बाद में सुचितदादा के पास गया। उन्होंने कहा, जाओ अब कुछ होगा नहीं। उसके बाद मैने अपने कल्ले कभी वापस दिखाए ही नहीं। इतना ही नहीं, बलविद्यामें बहोतों को बहुत साल प्रयत्न करके भी उसका कौशल प्राप्त नहीं होता। और सिर्फ पाचबार मार्गदर्शन करके “साहब”हमे तैयार करते थे।

कुछ सालों के बाद हमे पता चला, की साहब प्रवचन शुरु करनेवाले है। हमारे यह डाक्टर खेल के मार्गदर्शक, अचानक प्रवचन देनेवाले है। जो हमें हजम नहीं हो रहा था। तो भी हम प्रवचन सुनने के लिए शशिकांत सर के साथ एक गुरुवार गए। विज्ञान और अध्यात्म का गुढसंबंध उस प्रवचन में उन्होने किया था। उसके बाद हमारे जीवन में उनका “डाक्टर” से “बापू” यह प्रवास सुलभ सहज हो गया। क्योंकी हमारा जो उनसे नाता था वह प्रेमका, विश्वास का और आदर का था। शशिकांत सर का मन साहब ने हिम्मतसे भर दिया। उसी मन की शक्तीकें आधारपर हमारे सर ने भी अपने अपंगत्वपर मात कर दी। और बापूकी उपासना एवं भक्ती की, और राष्ट्रीयस्तर पर अनेक मल्लखांब के विद्यार्थी निर्माण किए।

आगे बापू का कार्य बढता गया। तो भी हर गुरुवार को प्रवचन खत्म होने के बाद निकलते समय उन्होंने आखिर तक शशिकांत सर के हात पर प्रसाद रखना छोडा नहीं।
कसरत के साथ-साथ साहब क्रिकेट खेलनेवालों को भी मार्गदर्शन करते थे। शिवाजी पार्कपर जो उत्सुकता से आगे आते उन्हें वह प्रशिक्षण देते। बहोतों को फास्ट बॉलिंग का सबक साहबने दिया। उस समय यशस्वी फास्ट बोलर होने के लिए तंत्रशुद्ध पद्धती क्या होती है, इसके वह फ्री में सबक देते। फास्ट बॊलिंग कायनोसोलोजी पर आधारीत होती है। कायनोसोलोजी याने की बॉडी ऍक्शन सायन्स है। जिसके अनुसार शरीर की हलाल योग्य प्रकार से होनेपर फास्ट बोलिंग करना कैसे मुमकीन होता है, इसका वह शिक्षण देते। उस समय बापू की कसरत भी जोरो से होती थी।

साहब के पास उस समय जो नॉलेज था और समज़ाने की शैली, वह ना उस समय दुसरों के पास थी ना आज भी है। बापू कुश्ती खेलते है, कुश्ती के प्रकार सारे बताते है। वह दांडपट्टा भी चलाते है, वह मल्लखांब के बारे में भी जानते है, वह उतनी सुंदरता से तलवार भी चलाते है। पहले साहब तो पत्थर पे भी घाव करते थे। चट्टान पर सराव करनेवाला यह प्रकार है, वज्रमुष्टी। इतना सब करनेवाले हमारे साहब हमारे सामने कितने-कितने रुपोंमे आए है।

ऐसे ही एक बार हमारे सामने से बापू आ रहे थे। हमने देखा की उनकी पँट घुटने तक फटी हुई है। हमने उनसे पूछा, क्या हुआ, तब साहब बोले, आते समय गड्डे में एक बैलगाडी गिर गयी थी। उस गाडीकें बैल को उठाके बापूने उने उस गड्डे से सहिसलामत बाहर निकाला था, २५०-३०० किलो के उस बैल को निकालते समय शायद उनकी पँट घुटने तक फट गई थी। हमारे साहब कैसे है, इसका और एक उदाहरण। आज पंधरह साल से हम बापू का मार्गदर्शन ले रहे है। इस दरमियाँन, बापू का परल का क्लिनिक दादर के राममारुती रोड पर नवनीत बिल्डींग में शिफ्ट हुआ। वहाँ पे जब उन के साथ मुलाकात हुई तब उनके हात की उंगली में एक नीले रंग के प्लास्टिक की अंगुठी दिखाई पडी, और दुसरे उंगली में हीरे की थी। जिनकी नजर उनके हातों पर जाती, उनकें मन में कुतुहल पैदा हो जाता। इसलिए एक दिन हमनें ही बापू को उस प्लास्टिक के अंगूठी के बारे में पूछा। तब बापू ने कहा, प्रवचन को आई एक वृद्ध महिला ने उन्हें वह अंगूठी भेटस्वरूप दी है। एक उंगली मे लाख रुपये की अंगूठी और दूसरे मे प्लास्टिक की, जिसका मोल “प्रेम’ था। वह अंगूठी डालकर सब जगह घुमते थे। मेडिकल कॊन्फरन्स हो या, क्लिनिक मे पेशंट को चेक करने के लिए जाना हो, यह दो अंगूठीयाँ हमेशा उंगलियों में दिखती थी।

शरीर की प्रचंड ताकद और उसी वक्त मनका बढप्पन ऐसा हमारा प्यार से भरा हुआ “साहब’ हमारी नजर में दूसरा कोई नहीं। सदगुरु तो वह है ही। लेकीन, उससे भी ज्यादा हम उनके फॅन है। बहुतसे लोग हमें पूछते है, तूम क्यों गए बापू के पास? हम आए क्योंकी हम उनके फॅन थे। १९९५ में तो हम उनसे कहते, हमे आपका हात देखना है। वो दिखाते थे। अचानक हाथी सामने आया तो हम क्या करेंगे? वैसे ही हम उनके साथ करते थे। कभी उनको मारते थे। फिर वह अपना हात और कंधा कडक करते। पिन से भी हमने उन्हें चूभा है। उनके कंधो में भी। लेकीन कुछ नहीं, मार्क नही, दाग नही, एक साधा स्क्रॅच भी नहीं। शायद किसीको विश्वास नहीं होगा।

एक ही आदमी आपकी तबीयत कि देखभाल करता है, वही आपको मार्गदर्शन करता है, वही आदमी आपको ८० पौंड का डंबेल्स सही तरीके से कैसे मारना है यह सिखाता है। वही आदमी आपके साथ कॉफी पिता है। वही आदमी आपके साथ वडापाव और सामोसाभी खाता है। वही आदमी आपको अपने अफाट शक्ति और सामर्थ्य की झलक दिखलाता है। वज्रदेह की पहचान कराता है। और खुद के स्वभाव से प्रेम और लगन क्या होती है इसकी झलक देता है । यह सब सिर्फ एक आदमी करता है, देखकर शायद किसीको यह अशक्य लगे। लेकीन, यह सब सिर्फ एक आदमी कर रहा था, हमारा “साहब” । इतना सब करते वह हमें दिख पाए, क्योंकी साहब के पास शक्ति और ताकद है इसलिए नहीं, वह तो उनके पास है ही, लेकीन उनके पास जो विशाल प्रेम है, उसके कारण ही वह “साहब” है अपरंपार शक्ति का स्त्रोत। “ह्युमंगस’”
१७ सालों तक प्रशिक्षण लेते समय जो हमनें जाना वह यहीं है।

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