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‘जेएनयू’ का विवाद और पार्श्वभूमि

06-pg01_Mumbai-6देशद्रोह के आरोप के तहत दिल्ली पुलीस द्वारा ग़िरफ़्तार किये गये छात्रनेता कन्हैया कुमार को अंतरिम ज़मानत पर रिहा किया गया। उसकी रिहाई के बाद ‘जेएनयू’ में जल्लोष मनाया जा रहा है। लगभग सभी वृत्तवाहिनियों (चॅनल्स) पर ‘कन्हैया’ के इंटरव्यू प्रसारित किये जा रहे हैं। इस छात्रनेता को कुछ लोग ‘राजनीतिक नायक’ के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं, ऐसे आरोप हो रहे हैं। उसी समय ‘जेएनयू’ यह देश को नये नये धक्के देनेवाले भूकंप का केंद्र बन चुका दिखायी दे रहा है।
नयी दिल्ली में रहनेवाले ‘जेएनयू’ नामक विद्यापीठ की जानकारी देश की अधिकतर जनता को थी ही नहीं। लेकिन गत कुछ दिनों से ‘क्या यह विद्यापीठ वाक़ई भारत में ही है?’ ऐसे प्रश्न सोशल मीडिया में तथा अन्य माध्यमों में भी पूछे जाने लगे हैं। देश की संसद में ‘जेएनयू’ को लेकर होहल्ला मच रहा है। सरकार एवं विरोधी पार्टियों के बीच विवाद उत्पन्न होना, यह हमारे जनतंत्रवादी देश के लिए कोई नयी बात नहीं है। लेकिन ‘जेएनयू’ को लेकर शुरू हुए विवाद की तीव्रता कई लोगों ने शायद पहली ही बार अनुभव की होगी। देशद्रोही घोषणाएँ और कारनामें, राष्ट्रीय सुरक्षा और अभिव्यक्तीस्वतंत्रता का मुद्दा ‘जेएनयू’ के विवाद के कारण निहाई पर आया है।
यह सारा देशव्यापी मंथन शुरू हुआ, ९ फ़रवरी को – ‘जेएनयू’ में आयोजित किये गए एक कार्यक्रम के बाद। सन २००१ में भारतीय संसद पर पाक़िस्तानपुरस्कृत आतंकवादियों ने हमला किया। इस हमले के पीछे ‘अफ़ज़ल गुरु’ था, यह बात स्पष्ट हो गयी और उसपर लगे आरोप सिद्ध होकर, सर्वोच्च न्यायालय ने उसे फ़ाँसी की सज़ा सुनायी। सन २०१२ में उसे फ़ाँसी दी गयी। इस फ़ाँसी का विरोध करके अफ़ज़ल का बलिदान दिन मनाने का कार्यक्रम ‘९ फ़रवरी’ को ‘जेएनयू’ में आयोजित किया गया था।
इस कार्यक्रम की जानकारी देनेवाला पोस्टर प्रक्षोभक है। अफ़ज़ल गुरु और आतंकवादी कारनामों के लिए फ़ाँसी की सज़ा हो चुका मक़बूल भट इनके तथाकथित (सो-कॉल्ड) बलिदान से प्रेरणा लेने का संदेश इस कार्यक्रम में दिया गया। कुछ लोगों ने ‘जेएनयू’ प्रशासन से इस बात पर ग़ौर फ़रमाया कि दावा कियेनुसार यह कार्यक्रम सांस्कृतिक न होकर, देशविरोधी है। उसके बाद इस कार्यक्रम को अनुमति नकारी गयी। मग़र फिर भी यह कार्यक्रम होकर ही रहा। इस समय ‘अफ़ज़ल, हम शरमिंदा हैं, तेरे क़ातिल अभी ज़िंदा हैं’, ‘कितने अफ़ज़ल मारोगे, हर घर से अफ़ज़ल निकलेगा’, ‘भारत की बरबादी तक, जंग़ रहेगी जंग़ रहेगी’, ‘कश्मीर माँगे आज़ादी’ और ‘पाक़िस्तान ज़िंदाबाद’ ऐसीं घोषणाएँ की जा रही थीं। इस संदर्भ में सात व्हिडिओज़ प्रकाशित हुए हैं। इनमें से दो व्हिडिओज़ के साथ छेड़ख़ानी की होने के आरोप किये जा रहे हैं। लेकिन बाक़ी के पाँच व्हिडिओज़, यहाँ पर क्या घटित हुआ, यह स्पष्ट रूप में दर्शा रहे हैं।
यहाँ पर देशविरोधी घोषणाएँ दी गयीं होने की जानकारी केंद्रीय मनुष्यबलविकास मंत्री स्मृती इराणी ने संसद में सबूतों के सहित प्रस्तुत की थी। उपरोक्त कार्यक्रम में ‘ऐसी घोषणाएँ किसीने भी नहीं दी हैं’ इस दावे से लेकर ‘वे घोषणाएँ देनेवाले कोई अलग ही थे’ इस प्रकार बचाव किया जा रहा है। ‘डेमॉक्रॅटिक स्टुडंट युनियन’ (डीएसयू) तथा ‘ऑल इंडिया स्टुडंट असोसिएशन’ (एआयएसए) इन संगठनों ने इस कार्यक्रम का आयोजन किया था। कन्हैया कुमार ‘एआयएसए’ का ‘जेएनयू’ में से चुनकर आया अध्यक्ष है। उसने ये घोषणाएँ दीं कि नहीं दीं, इसके बारे में अलग अलग जानकारी सामने आ रही है। लेकिन उसकी उपस्थिति में ये घोषणाएँ दी गयीं, यह बात स्पष्ट हो चुकी है। उसने इन घोषणा देनेवालों को रोकना चाहिए था। एक छात्रनेता के रूप में उसपर रहनेवाली ज़िम्मेदारी को उसने नहीं निभाया, ऐसी टिप्पणी उसे अंतरिम ज़मानत देते हुए न्यायालय ने की है।
कन्हैया कुमार, उमर ख़ालिद, अनिर्बन भट्टाचार्य इनपर देशद्रोह के आरोप लगाकर दिल्ली पुलीस ने उन्हें ग़िरफ़्तार करने के लिए प्रक्रिया शुरू की। कन्हैया को ग़िरफ़्तार किया गया। लेकिन उमर ख़ालिद और अन्य नौं लोग कुछ दिन लापता थे। कुछ दिन बाद उमर और उसके ये सहकर्मी ‘जेएनयू’ में वापस लौट आये। लेकिन उन्हें ग़िरफ़्तार करने के लिए दिल्ली पुलीस ने ‘जेएनयू’ के अहाते में प्रवेश करने का निर्णय नहीं लिया। ‘ ‘जेएनयू’ भारत में ही है या किसी अन्य देश में, जो छात्रों को ग़िरफ़्तार करने के लिए पुलीस को युनिव्हर्सिटी के प्रशासन की अनुमति की ज़रूरत पड़ती है?’ ऐसी संतप्त प्रतिक्रिया इस दौरान देश भर में उठ रही थीं। वहीं, कुछ लोग ‘युनिव्हर्सिटी की स्वायत्तता यह बहुत बड़ी बात होती है’ ऐसा युक्तिवाद कर रहे थे।
न्यायालय में ले जाते समय कन्हैया कुमार को कुछ वक़िलों ने मार-पीट की और उसकी सुरक्षा का भी प्रश्न संवेदनशील बन गया था। लेकिन ज़मानत पर छूटकर बाहर आया कन्हैया अब देश की राजनीति को बदलने की भाषा बोल रहा है। मेरा झगड़ा देश के विरोध में नहीं, बल्कि व्यवस्था के विरोध में है, सरकार के विरोध में है, ऐसा स्पष्टीकरण कन्हैया दे रहा है। लेकिन ‘जेएनयू’ यह देशविरोधी कारनामों का अड्डा बन चुका होने का आरोप अधिक से अधिक तीव्र बनता जा रहा है। इतना ही नहीं, बल्कि इस विद्यापीठ में बहुत पहले से ही देशविरोधी कारनामों का तथा और धार्मिक भावनाओं को ठेंस पहुँचानेवाले आक्षेपार्ह कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा था, यह बात भी अब दुनिया के सामने आ रही है। इस कारण, क्या वाक़ई इस विद्यापीठ में शिक्षा उपक्रम चलते हैं या यह विद्यापीठ देशद्रोही षड्यंत्रों एवं धर्मविरोधी बातों का केंद्र बन गया है, ऐसा प्रश्न उठ रहा है।

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